इश्क़ हारा नहीं बस जीत ये किस्मत गई थी
लिख मुकद्दर की लकीरों में भी फ़ुर्क़त गई थी
ज़िंदगी करनी है अब तो यूँ बसर तन्हा हमें
गैर हमसे तो हमारी ही, हो सूरत गई थी
इश्क़ है अब भी हमे उतना ही, सच कहता हूँ मैं
रूह में दिल से उतर, मेरी मोहब्बत गई थी
साँस में मेरी है बसती, वो तो ख़ुशबू की तरह
याद वो ज़िंदगी में बनती ज़रूरत गई थी
मेरी उम्मीद न तोड़ो मैं कहूँ भी कैसे
वस्ल की आरज़ू इस दिल से हो रुख़सत गई थी
पाना खोना तो मुकद्दर की ही बातें हैं सभी
दिल की चाहत तो नहीं ये ता-क़यामत गई थी
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