बहुत कुछ कहना था लेकिन किसे जज़्बात कहते
नहीं तुम पास किससे अपने हम हालात कहते
तेरी नाराजगी से जश्न भी मातम बना है
मेरा निकला जनाज़ा कैसे हम बारात कहते
ग़म-ए-दिल के ये अंधेरे सताते हैं बहुत अब
ख़ुशी के इन उजालों को भी हम तो रात कहते
उदासी का समाँ तारी रहेगा हम पे कब तक
हैं दर्द-ए-दिल में भीगे कैसे हम बरसात कहते
न आओगे कभी तुम लौट कर माने नहीं दिल
कसीली इतनी ख़ुद से कैसे हम भी बात कहते
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