काश इस मौसम में आग लग जाए
बहाना गर्मी का हो और खुशी मिल जाए
कब तक करते रहेंगे इंतजार इस सर्दी का
अभी गई भी नहीं और फिर मिल जाए
तुम्हारा एहसास सुबह की हवा की तरह है
जो दिखती भी नहीं और दीदार हो जाए
तुम हमारे हो ना हो पर थोड़ा यक़ीन हो जाए
एक बार मिलकर तो देखो शायद प्रेम हो जाए
मैंने खुशियों को कई बार आते जाते देखा है
हवा को ख़ुशी से बातें करते पहली बार देखा जाए
सब उसूल मालुम हैं दुनियां के यहां चाहत कहां
ख़ुशी से जाएगी तू एक दिन वहां, जहां हम कहां
यक़ीन ए मोहब्बत के दुश्मन यक़ीन 'ए हवा'
ऐसा चाहने वाला तुझे अगली सर्दी मिले ना मिले,,
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X