फ़ासले न बढ़ जाएँ फ़ासले घटाने से
आओ सोच लें पहले राब्ते बढ़ाने से
'अर्श काँप जाता था एक दिल दुखाने से
वो ज़माना अच्छा था आज के ज़माने से
ख़्वाहिशें नहीं मरतीं ख़्वाहिशें दबाने से
अम्न हो नहीं सकता गोलियाँ चलाने से
देख-भाल कर चलना लाज़मी सही लेकिन
तज्रबे नहीं होते ठोकरें न खाने से
एक ज़ुल्म करता है एक ज़ुल्म सहता है
आप का त'अल्लुक़ है कौन से घराने से
कितने ज़ख़्म छिलते हैं कितने फूल खिलते हैं
गाह तेरे आने से गाह तेरे जाने से
कार-ज़ार-ए-हस्ती में अपना दख़्ल इतना है
हंस दिए हँसाने से रो दिए रुलाने से
छोटे छोटे शहरों पर क्यों न इक्तिफ़ा कर लें
खेतियाँ उजड़ती हैं बस्तियाँ बसाने से
ज़ख़्म भी लगाते हो फूल भी खिलाते हो
कितने काम लेते हो एक मुस्कुराने से
और भी सँवरता है और भी निखरता है
जल्वा-ए-रुख़-ए-जानाँ देखने दिखाने से
जब तलक न टूटे थे ख़ैर-ओ-शर के पैमाने
वो ज़माना अच्छा था आज के ज़माने से
हर तरफ़ चराग़ाँ हो तब कहीं उजाला हो
और हम गुरेज़ाँ हैं इक दिया जलाने से
चाँद आसमाँ का हो या ज़मीन का 'नुसरत'
कौन बाज़ आता है उँगलियाँ उठाने से
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