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यादों की एक बस्ती में

                
                                                         
                            यादों की एक बस्ती में दिल भी कोई अकेला था
                                                                 
                            
चाहत थी न दोस्त था बस हालातों का मारा था

मंजर थे न रास्ते थे बस करवटें बदलता रहता था
सपनों की बंद दुनिया में आशिक वो भी आवारा था

मिलता था बिछड़ता था यादों से रोज झगड़ता था
नहीं नसीब में जो चीज़ें उनसे क्यूं मिलवाता था

ठोकर खाई जिससे पहले उसके लिए क्यूं सिसकता था
नई मंजर की तलाश में भी अफ़सोस पीछे रखता था
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11 महीने पहले

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