जो लोग तुम्हारी गलतियों का ही हिसाब रखते हैं,
उनसे क्या तुम अच्छाइयों का हिसाब मांगोगे।
जो देखना ही तुम्हें गिरते हुए चाहते हैं,
उनसे क्या तुम ऊँचाइयों का हिसाब मांगोगे।
जिनकी बीत गई ज़िंदगी तुम्हारी कमियाँ खोजने में,
उनसे क्या तुम वफ़ा की भीख मांगोगे।
इसलिए ऐ "दीप" बढ़ते चलो अपनी ही चाल में,
दुश्मनों से क्या तुम मोहब्बत की खैरात मांगोगे।
-प्रदीप त्रिपाठी "दीप"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X