किताबों के बोझ से निकल कर अब,
ज़िंदगी के नए पन्ने पलटने चली हूँ।
किसी की लिखी हुई कहानी का किरदार नहीं,
मैं तो ख़ुद अपनी कथा लिखने चली हूँ।
कल तक जो गुड़िया थी घर की दहलीज़ पर,
आज वो पंख फैलाए आसमान देख रही है।
१८ की इस दस्तक ने सिखाया है मुझको,
कि हर मंज़िल अब मेरा इम्तिहान देख रही है।
पढ़ाई की थकान है, और रास्ते अनजान हैं,
पर आँखों में बसे मेरे माँ-बाप के अरमान हैं।
'प्रतिज्ञा' की है मैंने, ख़ुद को साबित करने की,
क्योंकि मेरे हौसलों के आगे, शिकस्त भी हैरान है।
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