आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

किताबों के बोझ से निकल कर अब

                
                                                         
                            किताबों के बोझ से निकल कर अब,
                                                                 
                            
ज़िंदगी के नए पन्ने पलटने चली हूँ।
किसी की लिखी हुई कहानी का किरदार नहीं,
मैं तो ख़ुद अपनी कथा लिखने चली हूँ।
कल तक जो गुड़िया थी घर की दहलीज़ पर,
आज वो पंख फैलाए आसमान देख रही है।
१८ की इस दस्तक ने सिखाया है मुझको,
कि हर मंज़िल अब मेरा इम्तिहान देख रही है।
पढ़ाई की थकान है, और रास्ते अनजान हैं,
पर आँखों में बसे मेरे माँ-बाप के अरमान हैं।
'प्रतिज्ञा' की है मैंने, ख़ुद को साबित करने की,
क्योंकि मेरे हौसलों के आगे, शिकस्त भी हैरान है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर