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फसाना ए बेचैन जिंदगी

                
                                                         
                            हो गया गुमां तुम्हें जब से करके याद गुज़रा ज़माना अब अपना बिखरती यादों को होकर मायूस समेटना पड़ा हमें
                                                                 
                            
इतने खुशनसीब कहां जो बदल के फैसला अपना करूं दुश्मनी तुमसे मैं कभी सोच कर अंजाम घबराना पड़ा हमें
रहा खुदा कब गरीबों का बुझा कर दिया आस का करके तुमसे गुजारिश बार बार दर्द ए वफा भी सहना पड़ा हमें
ज़िंदगी गरीबों की हुई आसान कब जान कर गर्दिश ए हालात मेरा तुम हो ना सके मेरे कभी सच कहना पड़ा हमें
तड़पा के बेचैन दिल को फसाना ए ज़िंदगी समझना पड़ा हम ना रहे किसी काम के तजुर्बा तुमसे लेना पड़ा हमें
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34 मिनट पहले

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