करके जुल्म ओ सितम मुझ पर दिल अपना बहलाया जा रहा है मुझसे फासला बढ़ाने वाले दर्द मेरा बढ़ाया जा रहा है
सच ये गुज़ारा किसी महरूम का भी आसान इतना नहीं देकर तसल्ली हमें बार बार दिल अपना ही बहलाया जा रहा है
जाओ चिराग़ ढूंढ लो तुम ठिकाना कहीं और हमें अब उजालों की भी जरूरत नहीं करके वादे हमें समझाया जा रहा है
जुल्म किसी पर करने से पहले सदा उसकी तुम याद कर लेना सोच के नुकसान मुताबिक उसके हमें सताया जा रहा है
खाकर ठोकरें बार बार कांटों पर चलना हुआ नसीब हमें जान कर बदनसीबी इल्जाम मुझ पे बार बार लगाया जा रहा है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X