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फसाना ए महरूम जिंदगी

                
                                                         
                            कितनी बार हम रोए हैं सोच के गर्दिश ए हालात अपनी कितने मासूम हैं जो कह ना पाए कभी सामने तुम्हें देख कर
                                                                 
                            
था यकीं अपनी वफाओं पे बहुत मगर हुआ अचानक क्या दिल को जो बुझा कर चिराग़ जला ना पाए तुम्हें देख कर
गर तुम चाहो तो कर लो फैसला मेरे खिलाफ मर्जी के मुताबिक अंजाम ए वफा जो होगा सह हम लेंगे तुम्हें देख कर
गर मुताबिक तेरे हुआ मैं नहीं कभी तो करूं अब क्या गर कहो तो कर लूंगा गुज़ारा किसी तरह सामने तुम्हें देख कर
हालांकि सिलसिला आने जाने का लगा रहेगा हमेशा ख्वाब में दिल है कि मानता नहीं मगर जी लूंगा तुम्हें देख कर
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एक घंटा पहले

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