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क्रांति और कुर्बानी

                
                                                         
                            क्रांति और कुर्बानी
                                                                 
                            
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कौन उम्र भर
जीने का हक देता है
वीर क्रांतिकारियों को
वे तो अमर हो जाते हैँ
अपने कर्मो से।
कुछ आलोचक जीते जी
कुछ आलोचक बाद में
कीचड़ आज भी भगत सिंह,
आजाद की करती है आलोचना
शरीर मरता है क्रांति नहीं।
जो सच्चे हैँ भले हैँ
और गुलाम नहीं किसी के
वे कुर्बानी को समझते हैँ
सीख लेते हैँ कुर्बानी से
खुद को ऋणी समझते हैँ।
जो सबके लिए जीता है
और सबके लिए मरता है
खुशी अपने लिए नहीं
दूसरों के लिए लड़ता है
लहू में देशभक्ति का जज्बा है ।
इतिहास बताता है
आजादी सबको प्रिय नहीं
अपना आशियाना स्वर्ण का
तो गरीबी कहाँ दिखती है
पत्थर पिघलते हैँ पत्थर दिल नहीं।
जिसमें जुनून हो लड़ने का
और विश्वास कोई छल नहीं करेगा
छल होता है पर खुद को ही धोखा
विचार कभी मरते नहीं
की गयी हैँ हत्याएं दी गयीं फांसियां।
-पूनम पाठक 
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एक महीने पहले

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