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रोष स्थल

                
                                                         
                            राय एक बनी हुई है
                                                                 
                            
वही ही सच्चाई है

इतनी
पुनरावृत्ति होती है...

बनती
बार बार

एक ही आकृति है

तो 'सच' कैसे वो नहीं है?
मुझे सुनने तैयार कौन अजनबी है?

कागज़ में काश रुआंसी जोड़ पाता
कि हर सिरे पे होता क्रोध का धागा

टुकड़ा आपको,
मेरे एहसास महसूस करवा पाता

क्यों सब बहारें होके भी... लगती फिज़ा कब्रगाह 

तू तू मैं मैं से
छुटकारा कब मिलेगा

रिहा आम लोगों जैसे हो सकूं
इतनी मदद करो खुदाया

एक दीद भर से... साफ मन हो मेरा...

फिर क्यों आपने उधर मू फेरा?
-राहुल


 
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एक दिन पहले

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