जल-धरा की पुकार
जल को बचाना है,
धरा को हरा-भरा बनाना है,
सूखी इस माटी के तन में,
फिर जीवन रस जगाना है।
जब-जब बादल रूठ गए,
नदियों के स्वर टूट गए,
सूख गई हरियाली सारी,
पत्ते-पत्ते छूट गए।
तब धरती माँ ने पुकारा—
“अब तो तुमको आना है,
मेरी सूनी गोद में फिर से,
हरियाली को लाना है।”
जल को बचाना है,
धरा को हरा-भरा बनाना है…
बूँद-बूँद में सागर बसता,
हर कण में जीवन हँसता,
एक बूँद भी व्यर्थ न जाए,
हमें प्रकृति को सजाना हैं।
मत बहने दो यूँ ही जल को,
ये अमृत-सा खजाना है,
आज नहीं संभाला तुमने,
कल फिर पछताना है।
पेड़ लगाओ, छाँव बढ़ाओ,
सूनी राहों को महकाओ,
पंछी फिर से गीत सुनाएँ,
ऐसा सुंदर जग बनाओ।
जहाँ हवा में प्रेम घुला हो,
नदियों में मधुर तराना है,
हर बच्चे की हँसी में फिर से,
हरियाली को बसाना है।
जल को बचाना है,
धरा को हरा-भरा बनाना है…
आने वाली हर पीढ़ी को,
ये संदेश सुनाना है,
धरती माँ की सेवा करके,
अपना फर्ज निभाना है।
ना लो जितना लौटाओ उतना,
यही सृष्टि का तराना है।
प्रकृति संग जो प्रेम करेगा,
वही सच्चा दीवाना है।
चलो मिलकर कसम ये खाएँ,
हर बूँद को हम बचाएँ,
सूखी धरती की हर सांस में,
जीवन के रंग सजाएँ।
आज अगर हम जाग गए तो,
कल को फिर मुस्काना है,
जल को बचाना है,
धरा को हरा-भरा बनाना है।
-राजेश्वरी जोशी
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