शुरुआत को आख़िर से
जोड़ना भी कला है,
कुछ आदतों को
लगाए रखने में ही भला है.
लोग क्या कहेंगे,
यह सोच है सबसे फिज़ूल,
हमारे अहम ने ही तो
हमें सबसे ज़्यादा छला है.
बचपन की वह आदतें,
चूरन भी बांटकर चाटने की रिवायतें,
लुकाछिपी का खेल,
धींगामुश्ती के बाद फिर वही मेल.
चुपके से निकल पिताजी की सायकिल से
मुहल्ले का चक्कर लगा आना,
लगता है तरोताज़ा आजभी ऐसा,
जैसा एक ख़ूबसूरत फिल्म शो चलाना.
सलीम सोहन सिमरन और सिगमंड
सभी तो लंगोटिया यार थे,
एक सी थीं सभी की सूरतें,
शराफत और शरारत में हमख़्याल थे.
जबभी देखता हूँ आज इनको कहीं,
हाथ में झंडा और सीने पर धरम लगाए घूमते हैं,
बात बात में आवाज़ ऊंची उठाते हैं,
न जाने कौनसा नशा कर यह सभी झूमते हैं!!
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