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ज़रा सा इश्क़

                
                                                         
                            बड़े पत्थरदिल सनम होंगे,
                                                                 
                            
जिन्हें फूलों से सरोकार न हो,
इरादे नेक क्या ख़ाक होंगे,
गर ज़ुबाँ पे ज़रा भी प्यार न हो.

तलाशिये मत मुहब्बत के निशां,
वह तो उभर कर आते हैं चेहरे पे,
आंखों को पढ़ने का हुनर रखिये,
दिल पिंघलता ख़ुद-ब-ख़ुद सीने में.

हज़ारों ख़्वाब और हज़ारों ख़्वाहिशें मेरी,
हज़ारों दुआऐं के बाद नसीब जन्नतें तेरी,
लाखों मिन्नतों से राज़ी हुआ महबूब मेरा,
लगे है जैसे खुल गई या रब बारगाह तेरी.

कभी बस्ती उजड़ जाती आंधियों से,
कभी तूफानों में चलने का हौसला हुआ,
सब हमारी हिम्मतों का खेल है प्यारे,
क्या दुआओं से समंदर कभी ख़ाली हुआ!!

इंतज़ार करके देखिए जान-ए-जाना,
बड़ी मज़ेदार और हैरतअंगेज चीज़ है,
देखिये चलकर हमारे नक्श-ए-पैरों पे,
कितनी मेहंगी ये इश्क़ नाम की चीज़ है.

 
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3 दिन पहले

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