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महिमा नारी की

                
                                                         
                            नारी तेरी महिमा निराली
                                                                 
                            
देवियों की देवि महान है तू ।
त्याग और पावन प्रेम की रचना
ममता मयी कितनी दयावान है तू ॥

तेरा जीवन हो कितने संघर्षो भरा
परन्तु नारी सदा खुश नजर आती है तू।
हर पीडा हृदय में निज संजोये हुए
कर्तव्य अपने रहती निभाती है तू ।।

सामने वाले के आंसू पोंछते हुए
हृदय द्रवित पर नैन जल छिपाये है तू ।
कोई दुःख दर्द न समझ पाता सहज में तेरा
ऐसा अपना हाव भाव रखती बनाए है तू ।।

सदा सेवा भाव ज्योति अन्त: मे जलाये हुए
परोपकार वास्ते मानो यह जीवन पाये है तू ।
समस्या हो कितनी कठिन खड़ी सामने
उसके हल में हौशला बुलन्द रहती बनायें है तू ॥

सबकी व्यथाओं का भार सिर अपने लिए
अपनी ब्यथा न किसी को सुनाए है तू ।
हर संकट को सहती हसते परोपकार में
ध्यान अपना न कभी कर पाए हैं तू
बड़ी कर्मठ है रहती स्व कर्म कर्तव्य में
धर्म पथ पर मन सुदृढ़ सदैव बनाये है तू ।
निज पलकों में नमी होने को आती अगर
दूसरा न भाँप पाये ऐसा मुस्कराये है तू
लुटाती रही दूसरों की खुशी में अपनी खुशी
इसी में आनन्द अपना हमेशा मनाये है तू ।
धन्य है नारी तेरी जिन्दगानी निराली
हर बात में आशा का दीप जलाये है तू ॥
जीवन पथ के मोडो पर रिश्तों से जुड़ती हुई
बड़ी कुशलता से नाना रिश्ते निभाये है तू।
तपस्वनी बनी कभी बीरांगना हो गयी
समय समय पर क्या रूप लाये है तू ॥

कहीं मोहनी बनी कहीं किसी की छत्रछाया बनी
किसी की बहन तो किसी का माँग सिन्दूर भरायें है तू।
कभी जननी बनी कभी माँ दादी हुई
और नानी का भी नाम कहाये है तू ।
बन बुआ हर्षाती प्यार बरसाती रही
ननद भावज सम्बन्ध भी पाये है तू ।
यौ नाना रिश्तो से तू खूब सजती रही
सास माँ का भी धर्म निभाये है तू ।।

अनुसुइया बनी कभी भक्त मीरा हुई
त्रिदेवी सी देवि रूप बनाये है तू ।
श्रद्धा की पवित्र मूर्ति नारी ही बनी
सदा सदा से नारी पूज्यता को पाये है तू
सती सावित्री सी बन यम को भी पछारती
समय समय पर आ काली रूप दिखाये है तू ।।

मानवो द्वारा ही नहीं देवो द्वारा सम्मान पाती रही अपने बिना इन्हें भी अधूरा दर्शाये है तू
इतना सब होते तुझे समाज ठुकराता रहा
सदा सदा लोगों द्वारा सताने का संकट पाये है तू । इनकी भी बुराई न करती कभी भूल से
प्रभु की इच्छा जो मन में बसाये है तू ।।
जग वालों जागों नारि को पहचानो जरा
जगत निर्माती जगत अम्ब को सदा सिर झुकाये है तू ।
आदर की पात्र नारी तू सदा से रही
नाम अपने से प्रथम नाम इसका कहलाये है तू ।।
नमन करते कहो जीवन धन्य है नारी तुम्हारा
जो नारी रूप में जगत पर पग लाये है तू ।
भगवन सहारे सब रमन छोड़कर
अपना जीवन हमेशा धन्य बनाये है तू ।।
-रामकुमार जायसवाल रमन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

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