वो देखता है देखकर भी देखता नहीं।।
पत्थर कोई मेरी तरफ़ भी फेंकता नहीं।।
अगर हवा चले तो उसे पैग़ाम भेज दूं,,
नामाबर तो दर पर कोई झांकता नहीं।।
इक इशारा काफ़ी है सांस लेने के लिए,,
दिल मेरा मज़बूर है कोई गुरेख़्ता नहीं।।
नब्ज़ छूकर देख ले शायद ख़ुशी मिले,,
हर एक पर ये ज़िंदगी भी फ़रेब्ता नहीं।।
इल्ज़ाम दो या ना दो मगर एक बात है,,
उल्फ़त में दिल किसी की मानता नहीं।।
वो दूर से भी सब पे रख लेता है नज़र,,
और मैं हूँ के आँखें कभी सेंकता नहीं।।
यूं तो हजारों आए और आते रहेंगे देव,,
जहान में ग़ालिब सा कोई रेख़्ता नहीं।।
-सुनील देव
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