मृदु कोमल कलियों के अधरों पर,
किसने यह 'लिंग' का भेद मढ़ा?
व्याकरण की जड़ सीमा ने,
अस्तित्वों को कैसा बाँटा?
जो दाहक है, जो पावक है,
जो अड़ता...'पुल्लिंग' विशेष हुआ
जो झुकती, जो नत, जो शीतल,
उसका 'स्त्रीलिंग' अवशेष हुआ!
जो मरु की दाहक ज्वाला था,
उसे ‘पुल्लिंग’ का मान दिया,
पर जो शीतल सजल मेघ सी,
छाया बन जग पर छाती है,
उसे कोमल कह 'स्त्रीलिंग' का दान दिया?
वह मूक सहिष्णु 'धरा' नारी,
पर उसका उर जो भेद रहा..
वह क्रूर, लौह-मय 'हल' देखो,
पुरुषत्व का गौरव ले खड़ा!
तृष्णा की प्यास बुझाती जो,
कल-कल करती वह 'नदी' प्रिया
पर खारा, तृप्ति-विहीन 'सिंधु',
पौरुष का उसने नाम लिया!
किरणों की रेशम 'चाँदनी'...
सुकुमार 'स्त्रैण' सा आभास यहाँ
पर रौब झाड़ता 'सूर्य' प्रखर,
जैसे कोई सम्राट खड़ा!
यह व्याकरण के छंद नहीं,
मनुज-मस्तिष्क की छाया है,
जहाँ सृजन की मौन व्यथा को,
'नारी' की संज्ञा दी गई!
और पुरुष की कोमलता को,
भीतर ही भीतर दफ़्न किया,
न रोने का अधिकार दिया,
न खुल कर जीने का वरदान दिया!
पर भूल गया मानव शायद....
बिन धरा के हल कैसा?
बिन बूंदों के ये घन कैसा?
यदि शक्ति न हो इस कोमलता में,
तो सृजन का यह सम्मोहन कैसा?
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