बस्तियाँ जलती रहीं जब, वे खड़े चुपचाप रहे,
लिख रहा था सत्य धुआँ, तब मौन ही सब आप रहे।
चीखती मानवता रही पर, वज्र सम दरबार थे,
नाम पर संवेदना के, शब्द बस अख़बार थे।
रोटियाँ सपने जले सब, आस का भी अंत था,
शीर्ष सत्ता के शिखर पर, मौन का ही तंत्र था।
आज हम किससे कहें यह, दोष आख़िर किसका है?
राख होते आशियाँ का, दर्द केवल जिसका है।
आँकड़े कोई गिने तो, ढूँढ़ता कोई सियासत,
घाव पर मरहम नहीं, बस खोजते सब आज रियासत।
मंच लोकहित के सजे जो, भाषणों में वीर थे,
देखते जलते घरों को, मौन के जागीर थे।
राम कबीर और रहीम सब, पाठ मानव का पढ़ाएँ,
आग नफ़रत की बुझाने, प्रेम की वर्षा कराएँ।
जल रहा जो एक घर है, आज संकट सब पर आया,
द्वार उसके शोले बिखरे, कल हमारे पथ पर छाया।
भूलकर मत दल और जाति, हाथ आगे बढ़ाइए,
राख से फिर ज़िंदगी का, दीप मिलकर जलाइए।
पूछेगा इतिहास जब भी— "मौन तुम क्यों हो गए?"
क्या कहोगे तुम तब जब, लोग सब कुछ खो गए?
कुर्सियाँ रहती नहीं हैं, याद रहता व्यवहार है,
अश्रु मानव के जहाँ हों, वह बड़ा संसार है।
बस्तियाँ जलती रहीं जब, वे खड़े चुपचाप रहे,
वक्त की अदालतों में, आज दोषी आप रहे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X