लोग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को
मर्द वो हैं जो ज़माने को बदल देते हैं
आज बातें अकबर इलाहाबादी की, लेकिन पहले उनके एक-दो मजेदार किस्से क्योंकि अकबर इलाहाबादी हिन्दुस्तानी ज़बान और हिन्दुस्तानी तहज़ीब के बड़े और दिलेर शायर थे, उनकी शायरी में गंभीरता है और हास्य व्यंग्य भी है, और अकबर साहब की हाज़िर जवाबी के तो क्या कहने-
कलकत्ता की मशहूर गायिका गौहर जान एक मर्तबा इलाहाबाद गई और जानकी-बाई तवाइफ़ के मकान पर ठहरी शायद 1910 की बात है। गौहर की माँ नवाब वाजिद अली शाह के यहां दरबारी नृत्यांगना थी और पिता आर्मेनिया के थे। टप्पा कजरी, ठुमरी, झूला संगीत की हर विधा में उनका दखल था। शायद आधुनिक युग की पहली स्टार गायिका थी जिनके बहुत भाषाओं में रिकॉर्ड निकाले गए थे।
अब जब गौहर जान जाने लगीं होने लगी तो अपनी मेज़बान यानि जिनके यहाँ ठहरी थीं उनसे कहा कि “मेरा दिल ख़ान बहादुर सय्यद अकबर इलाहाबादी से मिलने को बहुत चाहता है।” जानकी-बाई ने कहा कि “आज मैं उनसे समय ले लूंगी, कल चलेंगे।” दूसरे दिन दोनों अकबर इलाहाबादी के यहाँ पहुँचीं। जानकी-बाई ने परिचय कराया और कहा ये कलकत्ता की निहायत मशहूर-ओ-मा’रूफ़ गायिका गौहर जान हैं। आपसे मिलने का बेहद इश्तियाक़ था, लिहाज़ा इनको आपसे मिलाने लायी हूँ।
अकबर ने कहा, “ज़ह-ए-नसीब, वर्ना मैं न नबी हूँ न इमाम, न ग़ौस, न क़ुतुब और न कोई वली जो क़ाबिल-ए-ज़यारत ख़्याल किया जाऊं। पहले जज था अब रिटायर हो कर सिर्फ अकबर रह गया हूँ। हैरान हूँ कि आपकी ख़िदमत में क्या तोहफ़ा पेश करूँ। ख़ैर एक शे’र बतौर यादगार लिखे देता हूँ।” ये कह कर एक शेर एक काग़ज़ पर लिखा और गौहर जान के हवाले किया।
ख़ुशनसीब आज भला कौन है गौहर के सिवा
सब कुछ अल्लाह ने दे रखा है शौहर के सिवा
कहा जाता है कि एक बार अकबर इलाहाबादी बीमार पड़ गये। उनकी आँखों की रोशनी जाती रही। एक अँग्रेज़ डॉक्टर मैनार्ड ने उनकी आँखों का ऑपरेशन किया और उस मन्दी के दौर में भी 200 रुपए फीस ले गए। अकबर साहब के बेटे ने पूछा, "अब्बाजान, अब तबियत कैसी है?"
अकबर साहब ने कहा-
"रोशनी आए तो हम देखें अपना हिसाब।
वह तो दो सौ ले गए आँखों पे पट्टी बाँध कर।"
अकबर इलाहाबादी हिन्दुस्तानी ज़बान और हिन्दुस्तानी तहज़ीब के बड़े मज़बूत और दिलेर शायर थे। उनके कलाम में उत्तरी भारत में रहने-बसने वालों की तमाम मानसिक व नैतिक मूल्यों, , तहज़ीबी कारनामों, राजनीतिक आंदोलनों और हुकूमती कार्यवाईयों के भरपूर सुराग़ मिलते हैं। अकबर की शायरी, ज़माना और ज़िंदगी का आईना है।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा जा के थाने में
कि 'अकबर' नाम लेता है ख़ुदा का इस ज़माने में
कहते हैं किसी समय दाढ़ी मुंडवाने का रिवाज हिंदुस्तान में आम था। लेकिन लार्ड कर्ज़न जब हिंदुस्तान आए तो उनकी देखा-देखी मूँछ भी सफ़ाया होने लगी। देखा देखी लोग डाढ़ी मूंछ साफ करने लगे फिर तो यह फैशन अंग्रेज़ीदानों में आम हो गया। अकबर साहब ने तंज करते हुए शेर इरशाद फ़रमाया,
कर दिया कर्ज़न ने ज़न मर्दों को सूरत देखिए
आबरू चेहरे की सब फ़ैशन बनाकर पोंछ ली
सच ये है इंसान को यूरोप ने हल्का कर दिया
इब्तिदा डाढ़ी से की और इंतिहा में मूँछ ली
अकबर की शायरी को महज़ हास्य शायरी के खाते में डाल देना अकबर के साथ ही नहीं उर्दू शायरी के साथ भी नाइंसाफ़ी है। ग़ज़ल क़ता, रुबाई और नज़्मों की शक्ल में अकबर ने जितना उम्दा कलाम छोड़ा वैसा आधुनिक युग के किसी शायर के यहाँ मौजूद नहीं।
अकबर इलाहाबादी ने अपनी पहली ही ग़ज़ल से अपने पढ़ने-सुनने वालों को अपना दीवाना बना लिया था। 21 साल की उम्र में अपने पहले मुशायरे में उन्होंने दो लाइनें कही थीं-
समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
अकबर ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का
इसके बाद अकबर इलाहाबादी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बड़ी ही सहजता और हल्के-फुल्के अंदाज़ में बड़ी बात कह जाने का हुनर अकबर के पास था।
दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है
तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
आह जो दिल से निकाली जाएगी
क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी
मशहूर उर्दू लेखक शम्सुर्रहमान फ़ारूख़ी ने अपनी किताब ‘अकबर इलाहाबादी पर एक और नज़र’ में लिखा, "मैं अकबर को उर्दू के पाँच या छह सबसे बड़े शायरों में शुमार करता हूँ और दुनिया के हास्य व्यंग्य साहित्य में अकबर का मुक़ाम बहुत बुलंद समझता हूँ। "
अकबर इलाहाबादी का जन्म 16 नवंबर, 1846 को इलाहाबाद के पास बारा गाँव में हुआ था। इनका मूल नाम सैयद अकबर हुसैन रिज़्वी था। शुरू में वो नौकरी की तलाश में बहुत भटके। फिर वो जमुना पुल के निर्माण के समय पत्थरों की नाप-जोख के मुंशी बन गए। बाद में उन्हें नकलनवीस की नौकरी मिल गई।
वर्ष 1867 में वो नायब तहसीलदार बन गए। उससे इस्तीफ़ा देकर उन्होंने हाइकोर्ट में काम किया। सन् 1873 में उन्होंने वकालत की परीक्षा पास की। उसके बाद उन्होंने सात साल तक इलाहाबाद, गोरखपुर, आगरा और गोंडा में वक़ालत भी की। सन 1880 में वो मुंसिफ़ हो गए और तरक्की पाते-पाते वो ज़िला जज के पद तक पहुंच गए।
वे रूढ़िवादिता एवं ढोंग के सख़्त ख़िलाफ़ थे और अपने शेरों में ऐसी प्रवृत्तियों पर तीखा व्यंग्य करते थे। उन्होंने 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम देखा था और फिर गांधीजी के नेतृत्व में छिड़े स्वाधीनता आंदोलन के भी गवाह रहे। वह अदालत में एक छोटे मुलाज़िम थे, लेकिन बाद में कानून का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया और सेशन जज के रूप में रिटायर हुए।
इलाहाबाद में ही 9 सितंबर, 1921 को उनका इंतक़ाल हो गया। जीवन के अंतिम वर्षों में महात्मा गांधी, देश की आज़ादी और हिंदू मुस्लिम एकता में अकबर की दिलचस्पी पहले से ज़्यादा बढ़ गई थी उन्होंने इन विषयों पर अपने विचार एक लंबी नज़्म में व्यक्त किए।
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