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बदल जाना

                
                                                         
                            कभी जो नरम था
                                                                 
                            
लहजे में आज
बेबाक तल्ख हो गया
जिद्दी भी तो नहीं था वो नादान सा आज घना दरख्त हो गया
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
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