आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अब तुम पर प्रतिबंध नहीं है

                
                                                         
                            शेष रहा अपना कोई अनुबंध नहीं है।
                                                                 
                            
जाओ अब तुम पर कोई प्रतिबंध नहीं है।।

एक भ्रमर के जैसे था तुममें जो विचलन,
बांध नहीं पाया वह ही तुमसे मेरा मन,
मेरा साथ सदा तुमको था पिंजरे जैसा,
जैसा तुमने चाहा मैं भी कब था वैसा,

छोड़ो अब मेरे मन में कुछ द्वंध नहीं है।
प्रीत निभे बेमन से वो संबंध नहीं है।।

कल आए थे और हमें कल जाना होगा,
जाने फिर क्या ऊपर ठौर ठिकाना होगा,
फिर क्यों रह कर साथ रहें उद्विग्न यहां हम
उलझी डोर अगर टूटी तो उसमें क्या ग़म,

जीवन किस्से जैसा, शोध प्रबंध नहीं है।
क्या होगा वो फूल कि जिसमें गंध नहीं है।।

स्वयं बॅंधे राघव मर्यादा के बंधन में,
संबंधों से हरदम कष्ट सहे जीवन में,
कृष्ण बचे कब भोग विछोह बॅंटे दो कुल में,
राजमहल को छोड़ा और पले गोकुल में,

सच है की रिश्ता कोई निर्बंध नहीं है।
लेकिन यह भी सच है मन पर बंध नहीं है।
-सीमा 'नयन'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर