खिड़की पर उनका ज़ुल्फ़ लहराना बेचैन कर गया ।
आंख मिला कर फिर छुप जाना बेचैन कर गया ।
जवां होते ही नज़ाकत और हया का पहरा हो गया,
सरे राह ठहर कर नक़ाब उठाना बेचैन कर गया।
जब भी वक़्त मिलता बस मुक्तसर सी बात होती,
हंस कर होठों पर ऊँगली लगाना बेचैन कर गया।
कई दिनों से उनकी खिड़की, चिलमन खामोश थी,
सहेली से जुदाई का पैग़ाम पाना बेचैन कर गया।
मोहब्बत की मियाद पूरी हो गयी,सफर ख़त्म हुआ,
ग़में इश्क़ का फलसफा बताना बेचैन कर गया।
बड़ी शान से दुल्हन बन डोली में वो जा रहे थे,
वफ़ा को ठुकरा कर मेंहदी दिखाना बेचैन कर गया।
अब स्याह रात और तन्हाई शकील का मुक़द्दर है,
पत्थर बन धीरे से उनका खत जलाना बेचैन कर गया।
-शकील सिद्दीकी
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