ईमानदारी के चोले में छुपी बेईमानी लिखूं।
लाचार, बेबस, सूनी आँखों का पानी लिखूं।
बचपन के पहले बुढा़पे की आनी लिखूं।
या बुढा़पे के पहले मौत की कहानी लिखूं।
काली अंधियारी रजनी की मनमानी लिखूं।
बेबस इंसानों की करूण कहानी लिखूं।
या फिर इधर-उधर की उल-जलूल बातें।
क्या लिखूं..?
चाटुकारियों की लम्बी कतार में,
अपनी बारी का इंतजार कर रहा,
सबसे पीछे खडे़ प्रजातंत्र की बात लिखूं।
विस्मृत हो रहा आज मानक मापदंड।
कैसे कर लूं यकीन उनकी दलीलों का।
कहो, आंकडो़ की जमीनी हालात लिखूं।
क्या लिखूं..?
डोजरों के डर से कांपती हुई बस्तियां।
जिन पर था भरोसा, उन्हीं की मौन सहमति..!
विजित पार्टियों की रसायनिक प्रतिक्रया, या
उसमे निभा रहे उत्प्रेरक की खूबियाँ लिखूं।
भ्रष्ट नेताओं के पल भर में धुलते दाग लिखूं।
राजनीति की गिर रही दर-बदर शाख लिखूं।
क्या लिखूं..?
किस कौम के किसान ने सेव को उगाया।
किसके उगाए अन्न देवताओं को नही भाया।
छोटी आँख वाले गणपति को क्यों घर लाया।
हिन्दू नहीं मुस्लिम, बेचने वाले का धर्म बताया।
बोलो नेताओ की सजायी मजहबी दुकान लिखूं।
या उसमे बिक रहे सामानों का अंजाम लिखूं।
क्या लिखूं..?
- शम्भु प्रसाद
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