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अनाहत-स्पंद : स्पंद-काव्य

                
                                                         
                            शून्य-द्वार पर मौन खड़ा था,
                                                                 
                            
काल स्वयं निस्पंद हुआ।
एक अगोचर छाया छूकर,
अंतर में नव छंद हुआ॥

नभ ने कुछ भी कहा नहीं था,
फिर भी संदेशा आ पहुँचा।
बिना शब्द के प्राण-पटल पर,
किसने अपना नाम उकेरा॥

नीरव वन के मध्य कहीं से,
अनसुना आलाप उठा।
ज्यों अनहद की सूक्ष्म तरंगों,
में जीवन का ताप उठा॥

पवन नहीं था, दीप न डोला,
फिर भी कंपन जाग गया।
बंद कपाटों वाले मन में,
कौन अनाहत जाग गया॥

ओस-बिंदुओं में छिपा हुआ था,
सूरज का अव्यक्त प्रकाश।
क्षण भर में ही बिखर गया वह,
बनकर चेतन मधुमय श्वास॥

नदियाँ बहती रहीं मौन ही,
पर्वत अचल समाधि लिए।
किन्तु शिला के अंतरतम में,
किसने स्पंदन-बीज दिए॥

मैं भी अपने आप से बाहर,
अपने भीतर लौट चला।
एक अदृश्य स्पर्श पाकर,
शून्य स्वयं ही ज्योत बना॥

जहाँ न आदि, न कोई अंत है,
वहीं प्राण का सत्य निहित।
मौन उसी का शाश्वत स्वर है,
स्पंद उसी का दिव्य गीत॥
- सनातन मुकुंद
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एक घंटा पहले

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