शून्य-द्वार पर मौन खड़ा था,
काल स्वयं निस्पंद हुआ।
एक अदृश्य स्पर्श से जैसे,
प्राणों में नव छंद हुआ॥
नभ ने कुछ भी कहा नहीं था,
फिर भी संदेशा आ पहुँचा।
बिना जले ही दीप हृदय का,
अंतरतम में स्वयं सुलगा॥
मैं जग का पथ खोज रहा था,
पथ मुझमें ही जाग उठा।
क्षण की सीमित देहरी पर,
अनन्त अचानक झलक उठा॥
शब्द जहाँ थककर सो जाते,
वहाँ अर्थ मुस्काते हैं।
मौन-तरंगों के उपवन में,
स्पंद स्वयं गुनगुनाता है॥
-सनातन मुकुंद
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