आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अंतर्मन का साक्षी : दार्शनिक मुक्तकमाला

                
                                                         
                            मौन-सरोवर में डूबा, चेतन का आलोक वही,
                                                                 
                            
श्वासों के संगीत तले, जागृत अंतरलोक वही।
जग के सारे दर्पण झूठे, रूप बदलते क्षण-क्षण,
सत्य-सुधा का नित्य निर्झर, अंतर्मन का साक्षी वही।

जब भ्रम के बादल घिरते, दीप नयन का बुझ जाता,
मोह-जाल में उलझा जीवन, पथ अपना ही खो जाता।
बाह्य दिशाएँ देतीं केवल, क्षणभंगुर संकेत सभी,
भीतर बैठा मौन ऋषि ही, सत्य-दिशा दिखला जाता।

राग-विराग के मध्य सदा, समता का मधुगान वही,
हर्ष-विषाद की लहरों ऊपर, अचल अमृत-विधान वही।
काल चुराए तन का वैभव, नाम, यश और मान सभी,
जिसे न छू पाए परिवर्तन, अंतर्मन का प्राण वही।

शब्द जहाँ सब थम जाते हैं, मौन वहाँ उच्चार बने,
शून्य स्वयं भर उठता जब, ब्रह्म-स्वरों के हार बने।
जो निज अंतर उतर सका, वह पा ले अनहद का स्पर्श,
अंतर्मन का साक्षी जागे, जीवन का आधार बने।
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर