मौन-सरोवर में डूबा, चेतन का आलोक वही,
श्वासों के संगीत तले, जागृत अंतरलोक वही।
जग के सारे दर्पण झूठे, रूप बदलते क्षण-क्षण,
सत्य-सुधा का नित्य निर्झर, अंतर्मन का साक्षी वही।
जब भ्रम के बादल घिरते, दीप नयन का बुझ जाता,
मोह-जाल में उलझा जीवन, पथ अपना ही खो जाता।
बाह्य दिशाएँ देतीं केवल, क्षणभंगुर संकेत सभी,
भीतर बैठा मौन ऋषि ही, सत्य-दिशा दिखला जाता।
राग-विराग के मध्य सदा, समता का मधुगान वही,
हर्ष-विषाद की लहरों ऊपर, अचल अमृत-विधान वही।
काल चुराए तन का वैभव, नाम, यश और मान सभी,
जिसे न छू पाए परिवर्तन, अंतर्मन का प्राण वही।
शब्द जहाँ सब थम जाते हैं, मौन वहाँ उच्चार बने,
शून्य स्वयं भर उठता जब, ब्रह्म-स्वरों के हार बने।
जो निज अंतर उतर सका, वह पा ले अनहद का स्पर्श,
अंतर्मन का साक्षी जागे, जीवन का आधार बने।
-सनातन मुकुंद
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