भगवान सब देख रहा है, सब सुन रहा है,
पर क्यों खामोश बैठकर ये ताना-बाना बुन रहा है?
ये सवाल लेकर जब मैं ज़मीन की ओर झुका,
चींटियों को चलते देखा… तो मेरा ज़ेहन वहीं रुका।
वो कतार में चलती हैं, अपना बोझ उठाती हैं,
उनकी जद्दोजहद, उनकी बातें… हमें कहाँ समझ आती हैं?
उनके झगड़े, उनकी मेहनत—हमारे लिए बस एक नज़ारा है,
शायद भगवान के लिए भी, ये इंसान चींटी बेचारा है।
हमारे मसले हमें आफ़त लगते हैं, हमें रुलाते हैं,
पर उसके हिसाब से, ये बस “चींटियों वाले खेल” कहलाते हैं।
शायद उसकी एक पलक झपकती हो तसल्ली से,
और सात पीढ़ियाँ गुज़र जाती हों यहाँ जल्दी से।
वो जब तक देखे मुड़कर, यहाँ सदी बदल जाती है,
इंसान की बिसात ही क्या, जो पल भर में ढल जाती है।
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