आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नज़र का फेर

                
                                                         
                            भगवान सब देख रहा है, सब सुन रहा है,
                                                                 
                            
पर क्यों खामोश बैठकर ये ताना-बाना बुन रहा है?
ये सवाल लेकर जब मैं ज़मीन की ओर झुका,
चींटियों को चलते देखा… तो मेरा ज़ेहन वहीं रुका।
वो कतार में चलती हैं, अपना बोझ उठाती हैं,
उनकी जद्दोजहद, उनकी बातें… हमें कहाँ समझ आती हैं?
उनके झगड़े, उनकी मेहनत—हमारे लिए बस एक नज़ारा है,
शायद भगवान के लिए भी, ये इंसान चींटी बेचारा है।
हमारे मसले हमें आफ़त लगते हैं, हमें रुलाते हैं,
पर उसके हिसाब से, ये बस “चींटियों वाले खेल” कहलाते हैं।
शायद उसकी एक पलक झपकती हो तसल्ली से,
और सात पीढ़ियाँ गुज़र जाती हों यहाँ जल्दी से।
वो जब तक देखे मुड़कर, यहाँ सदी बदल जाती है,
इंसान की बिसात ही क्या, जो पल भर में ढल जाती है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर