मां-बाप की ढलती उमर में जब, उनको थकान आती है,
आंखों की रोशनी भी जब, धीरे-धीरे ढलती जाती है।
तब बेटा बनकर दीपक, राहों को रोशन करता है,
"मै हूँ" चिंता मत करना, कह कर हिम्मत भरता है।
जिन हाथों ने पकड़ उसे, चलना सिखलाया था ,
जब भी गिरा "कुछ नहीं बेटा" कह कर के उठाया था।
आज हाथ जो कांप रहे हैं, वे कुछ मदद चाहते हैं,
उनकी सेवा में लगना ही संस्कार कहाते हैं।
जब तू छोटा था रोता तो ,उन्हें नींद न आती थी।
तेरी खुशियों के खातिर, खुद की नींद भी त्यागी थी।
अब उनकी हर आहट में, तू प्यार का सागर भर देगा,
उनकी हर एक जरूरत को, खुशियों के धन से भर देगा।
बुढ़ापा है कोई बोझ नहीं, ये सबसे बड़ा अनुभव है,
मां-बाप का आशीर्वाद ही उसकी, सबसे बड़ी संपत्ति है।
वृद्धापन को जो बेटा समझे,कोई उससे बड़ा महान नहीं,
मां बाप की सेवा जो करता,उससे बढ़कर संतान नहीं।
न धन-दौलत किसी काम आए, न ही ऊँचे घर-द्वार,
मां बाप को गर कोई कष्ट हुआ,वह ना सच्चा सत्कार।
उनकी मुस्कानों में ही, तेरी जीत छुपी रहती है,
उनके चरणों में ही, तुमको हर खुशियां मिलती हैं।
अपने बुढ़ापे का सुंदर और सफल रास्ता पाएगा,
तेरा भी दुख कटेगा ऐसे,सुख जीवन में पाएगा।
अपने कर्मों से जब तू उनकी लाठी बन पाएगा,
उसी कर्म का फल जीवन में आगे तू भी पाएगा।
-सूबा लाल "अंजाना"
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