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पत्थर को सिर-मौर बनाया

                
                                                         
                            हौसला तो बखूबी है मगर रखे कहाँ।
                                                                 
                            
तुम्हे क्या मालूम क्या गुजर रही यहाँ।।

कितने पापड़ बेले थे तुम तक आने में।
शायद उसका पश्चाताप कर रही यहाँ।।

हथेलियाँ देखकर कुछ मिला नही मुझे।
खुशकिस्मती लकीरों में रहती नही यहाँ।।

तुम अन्दर बैठकर मौज ले रहे मुझसे।
मेरी पल-पल तबियत बिगड़ रही यहाँ।।

जिस पत्थर को सिर-मौर बनाया मैंने।
उससे वाजिब शान्ति मिलती नही यहाँ।।

कई फ़साने है मेरी जान फ़ना होने के।
मेरी कमजोरी तूँ 'उपदेश' चैन नही यहाँ।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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एक घंटा पहले

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