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ख़ालिद मोईन: सुनो अब हम मोहब्बत में बहुत आगे निकल आए

khalid moin famous ghazal suno ab hum mohabbat mein bahut aage nikal aaye
                
                                                         
                            
सुनो अब हम मोहब्बत में बहुत आगे निकल आए
कि इक रस्ते पे चलते चलते सौ रस्ते निकल आए

अगरचे कम न थी, चारा-गरान-ए-शहर की पुर्सिश
मगर! कुछ ज़ख़्म-ए-ना-दीदा बहुत गहरे निकल आए

मोहब्बत की तो कोई हद, कोई सरहद नहीं होती
हमारे दरमियाँ ये फ़ासले, कैसे निकल आए

बहुत दिन तक हिसार-ए-नश्शा यकताई में रक्खा
फिर इस चेहरे के अंदर भी कई चेहरे निकल आए

पुराने ज़ख़्म भरते ही, नए ज़ख़्मों के शैदाई
मिज़ाज-ए-आइना ओढ़े हुए घर से निकल आए

तज़ाद-ए-ज़ात के बाइ'स खुला वो कम-सुख़न ऐसा
अधूरी बात के मफ़्हूम भी पूरे निकल आए 
12 घंटे पहले

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