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अंधेरी रातों से ग़ुफ़्तगू

                
                                                         
                            इन अधरों से भी
                                                                 
                            
ज़रा गुफ़्तगू कर लो,
ये कितने अश्क, कितने ग़म
पोशीदा हैं, ये भी सुन लो…
जो तबस्सुम के पीछे छुपा है,
उस दर्द को पहचान लो,
मैं जो ख़ामोश रहता हूँ,
उस ख़ामोशी का भी मान लो।
हर शब यूँ ही गुज़र जाती है,
तन्हा ख़यालों में डूबकर,
कोई होता जो समझ लेता,
तो हम यूँ ना बिखरते टूटकर।
अब आदत सी हो गई है,
चुपचाप बिखर जाने की,
महफ़िल में मुस्कुराने की,
और तन्हाई में मर जाने की।
कभी सोचा था कोई होगा,
जो बिन कहे सब समझ जाएगा,
मगर अब हर रिश्ता यहाँ,
वक़्त के साथ बदल जाएगा।
मैं चीखता भी हूँ अंदर से,
मगर सदा बाहर नहीं आती,
ये जो ख़ामोशी है ना मेरी,
हर दास्तां कह जाती।
अब उम्मीद भी थक चुकी है,
ख़्वाब भी सब सो गए हैं,
जो अपने लगते थे कभी,
आज वो भी खो गए हैं।
कभी फ़ुर्सत मिले तो आकर,
मेरे हालात भी पढ़ लेना,
मैं जो ठीक हूँ कहता हूँ,
उस झूठ को भी समझ लेना…
अब तो अपनी ही मौजूदगी अजनबी सी लगती है,
जी भी रहा हूँ या नहीं… ये भी यक़ीन नहीं होता।
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एक घंटा पहले

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