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अब अपनों में गैरों की पहचान कहाँ।

                
                                                         
                            अब पहले के जैसे वो इंसान कहाँ
                                                                 
                            
मर मिटते थे जिस पर वो ईमान कहाँ।

चिपके हैं अब बूढ़े भी मोबाइल पर,
हाथों में अब गीता या कुरआन कहाँ।

सुख-दुःख में कोई भी देता साथ नहीं,
अब अपनों में गैरों की पहचान कहाँ।

गुंडे-बदमाशों की इज्जत होती है,
विद्वानों को मिलता वो सम्मान कहाँ।

नकली चीज़ों से हैं सब बाज़ार भरे,
असली मिलता अब कोई सामान कहाँ।

रील बनाने का है लोगों पर अब भूत चढ़ा,
पढ़ने-लिखने में बच्चों का ध्यान कहाँ।

'पॉप' सुना करते हैं ग्वाले मधुवन में,
खोयी कन्हैया की बंशी ने अपनी तान कहाँ।

बुरा मानते हैं समझाने पर भी वो,
'बादल' इनको भले-बुरे का ज्ञान कहाँ।
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41 मिनट पहले

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