भूल ही चुके हम वो सारी बीती बातें,
मगर उस रात की निशंगता याद रही,
मन न बहलाए थे जिस महफ़िल में,
फिर भी हमें वह गतसंगता याद रही।
शब भर की परिचर्चा थी हमारे बारे में,
हज़ारों कहानियों की कड़ियाँ आम थीं,
गहरे दर्द को छिपाकर बस जी भर के
मुस्कुरा रहे थे हम,वो आसंग याद रही।
जिसके संग हमने सच्चे रिश्ते जोड़े थे,
वो हमें घने अंधेरे कोठी पर छोड़ चला,
मज़े में था मगर जिगर से निकलते ही
निर्दयी तूफ़ान का रुख़ मोड़कर चला।
ऊँचे ताड़ से क्यों इतने सवाल पूछ रही
बेरहम दुनिया, जवाब तो हमें नहीं मिला,
कैसे कहूँ कि ज़ुल्म कितना हुआ वहाँ
एक दो नहीं, लाखों वादे वो तोड़ चला।
खामोश है घुँघरू, महफ़िल भी सो गई,
कल तक थी रौनक, आज कहाँ खो गई,
समेटकर अपने ज़ख्मों का सारा कारवां,
सारी नज़रों से दूर, हम कहीं गुम हो गए।
जहाँ पर रिश्तों की कुछ भी कद्र नहीं,
वहाँ बेचारे दिल को दुखाना छोड़ दिया,
उस निठुर दुनिया की तंग गलियों में
हमने अब आना - जाना ही छोड़ दिया।
- साई नलिनी
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