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वर्षा की पहली बूंद

                
                                                         
                            **वर्षा की पहली बूंद**
                                                                 
                            

तपती धरा के सूने मन पर,
जब पहली बूंद उतर आती है,
माटी की भीनी-भीनी खुशबू
जैसे कोई याद जगा जाती है।

बादल चुपके से कुछ कहते हैं,
पवन मधुर संगीत सुनाती है,
सूखी डालों की हर धड़कन में,
नई कोंपल मुस्काती है।

पहली बूंद कोई जलकण नहीं,
ईश्वर का कोमल आशीष है,
थके हुए हर मन के भीतर,
जीवन का फिर से प्रवेश है।

मोर पंख फैलाकर नाच उठे,
नदियाँ अपना राग सुनाएँ,
खेतों की हर साँस में फिर से,
सपनों के बीज लहलहाएँ।

सीख यही देती है वर्षा—
हर तपन का अंत भी होगा,
धैर्य अगर तुम साथ निभाओ,
सुख का सावन अवश्य संजोएगा।

आओ पहली बूंद को छूकर,
मन के सारे मैल बहा दें,
प्रेम, करुणा, आशा के दीपक
हर दिल में फिर से जला दें। :::
-अतिशा माथुर
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
55 मिनट पहले

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