भरे हुए कुछ घड़े पाप के, यूं ही फूट रहे हैं
या सत्ता के हैं तिलिस्म, जो के अब टूट रहे हैं
ऐसे धर्मद्रोहियों को, सूली पर टांगा जाए
बनकर जो महमूद गजनवी, मंदिर लूट रहे हैं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X