आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शीर्षक : इश्क़ की आख़िरी गवाही

                
                                                         
                            आज़माया कईयों ने मुझे, पर मैं बिखरा नहीं,
                                                                 
                            
मोहब्बत आज भी तेरी ज़िंदा है मुझमें कहीं।
बदल गए लोग, बदल गए मौसम, बदल गई राहें,
मगर तेरे नाम पर धड़कता ये दिल बदला नहीं।
जिसे लोग हार समझ बैठे, वही मेरी वफ़ा थी,
मैंने इश्क़ छोड़ा नहीं, बस उसका शोर किया नहीं।
तू किसी और की दुनिया में मुस्कुराती रही,
मैंने तेरी ख़ुशी के आगे कोई सवाल किया नहीं।
ये इश्क़ था जनाब, कोई सौदा नहीं,
जो हर नए चेहरे पर दोबारा हो जाए।
मैं आज भी वहीं हूँ, जहाँ तू मुझे छोड़ गई थी,
बस फ़र्क़ इतना है कि अब किसी से शिकायत नहीं।
आज़माया कईयों ने मुझे, पर मैं बिखरा नहीं,
मोहब्बत आज भी तेरी ज़िंदा है मुझमें कहीं।
— विकास त्रिपाठी "विक्की"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर