एक वक़्त तक तो मैं भी बड़ा ख़राब था।
एक ज़िंदगी गुज़र गई है अच्छा बनने में।
घरवालों का बिगड़ा बेटा था।
मुझे किसीकी नफ़रत ने नहीं सुधारा।
सुधारा है मुझे मेरी ही मोहब्बत ने।
तबाही भी मेरी जिदंगी का एक हिस्सा रही।
मैं था, हर वक़्त ज़ल्दबाज़ी में।
मेरी रातों की नींद उड़ गई।
जब देखा मैंने अपने मां, बाप को खून पसीने में।
मुझे हकीक़त का तब एहसास हुआ।
मानो प्यार व्यार सब बकवास हुआ।
मैंने थाम लिया सब्र का हाथ।
निभा लिया पढ़ाई से गहरा साथ।
कुछ दिन तो यूं गुजरे।
मानो जंग जीत ली हो मैंने।
मुझे शराब का शौक़ नहीं।
ज़हर की ही आदत थी।
सो जिदंगी की कड़वाहट, दो घूंट में पी ली मैंने।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X