मस्ती मज़ाक में जी मैंने ज़िंदगी।
इसीलिए आज कमजोर बना बैठा हूँ।
धन दौलत नहीं मेरे पास।
एक बंगला है और मैं उसमें फ़िज़ूल रहता हूँ।
मैंने अपनी तबाही खुद ही लिख दी है।
ख़ुदा छोड़ इंसानों जो मोहब्बत कर ली है।
मैंने किए हैं कांड कई।
जवानी भी अब ख़ौफ खाने लगी है।
मैं मौत से डरने वालों में से नहीं हूँ।
ये तो नामुमकिन ज़िंदगी है जो डराने लगी है।
मेरे पास पैसा नहीं है।
लोगों की तरह मेरा हाल भी वही है।
रोज़ का खर्चा उठाऊं कैसे कुछ पता नहीं है।
मैंने लिख दी है चिठ्ठी प्रधानमंत्री जी को।
की कानून व्यवस्था बदलो।
अगर नहीं होगा उनसे कुछ।
तो मेरे पास मौत पड़ी है।
मैं तो चुन लूंगा मौत को।
मग़र खयाल रहे मेरे पीछे पूरी पीढ़ी पड़ी है।
मैं घायल सा ही जिया हूँ।
शिकारी ही मेरे नसीब में लिखी है।
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