मैंने खुदकी कभी सुनी ही नहीं।
ना मोहब्बत में, ना ज़िंदगी में।
कोसता रहा खुदको।
ग़लत था मेरा निर्णय।
रोका खुदको वहां भी जहां बहना था।
टोका खुदको वहां भी जहां बोलना था।
मुझे मेरी परेशानी समझ ही नहीं आई।
मैं बर्बाद हुआ धीरे धीरे।
कोई मजबूरी नहीं।
मुझे किसीने जीने की रीत नहीं सिखाई।
मैं मरता रहा दिन रात।
गुजर जाना इस ज़माने से मुझे आया नहीं।
मैं नाकाम हुआ वहां भी।
मुझे जीना मुश्किल लगा, और मौत नामुमकिन।
मुझमें आई ताक़त ख़ुदा की देन थी।
मुझे मुझसे जुदा किया मेरी मोहब्बत ने।
नफ़रत करता रहा मैं ज़माने से।
मुझे मेरी ही ताक़त ने मार डाला।
सुबह उठा तो नया सुरज उगा डाला।
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