की मुझे कुछ अच्छा लगता नहीं है।
मैं वहां रहता हूँ जहां ख़ुदा भी आता जाता नहीं है।
मुझे मिला है दर्द मेरे नसीब में इतना।
की कोई चिकित्सक वहां आता जाता नहीं है।
मैं चाहता हूँ स्वस्थ रहना।
खान पान में सुधार लाना।
एक मेरा मन है जो मुझसे संभलता नहीं है।
और मैं तो कविता भी नहीं लिखने वाला था इस जस्बात पर।
मग़र मेरा मन है कि मानता नहीं है।
मेरे मन में कोई ठहराव नहीं है।
मेरे जस्बात बहते हैं पानी की तरह।
मेरा दिल जो कि है मोम की तरह।
जितना जलाओगे उतना पिघलता जाता है।
मानो कोई ठोस चीज़ ही ना हो जैसे।
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