मेरा जमीन से रिश्ता गहरा है।
आसमान से सुनहरा है।
मैं मांगता हूँ ज़्यादा।
सोचता हूँ ज़्यादा।
लिखता हूँ ज़्यादा, मगर थोड़े का इरादा है।
ये जंग तो जीत ली मैंने।
मग़र शुरुआत में तो सब कुछ हारा है।
मुझे कल का कुछ पता नहीं।
कल का खाया आज याद नहीं।
सुबह का पढ़ा अभी भूल गया हूँ।
मैं चंद लम्हों में झूल गया हूँ।
मुझसे मैं नहीं संभलता।
किसी और को क्या रास्ता दिखाऊं।
मुझे मेरे अंदर की गहराई नज़र नहीं आती।
मैं अंधा नहीं, हो गया हूँ जस्बाती।
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