ये क्या हो रहा है।
मैं जानता हूँ मेरी दौलत को।
और मुझे ही महल दिखाया जा रहा है।
मुझे ही खरीदना है उसे।
और मुझे ही खरीददार बताया जा रहा है।
यूं तो नसीब है उसका।
संवारने ये ज़माना मुझे लगा रहा है।
मैं कोई मालिक नहीं हूँ।
जो मुझे ख़ुदा बताया जा रहा है।
मैं कोई ग़ुलाम अच्छा हो नहीं सकता।
मुझे तो मालूम भी नहीं, मुझे क्या बताया जा रहा है।
मेरा गहना है लिखना मेरा।
और मुझे ही सब कुछ बताया जा रहा है।
ये क्या हो रहा है।
मैं चाहता जिस जमीन को हूँ।
मुझे ही उसका मालिक बताया जा रहा है।
ये दीवानापन नहीं तो और क्या है।
मैं लिखता हूँ रोज कुछ ना कुछ।
नहीं लिखना मेरा नसीब कहां है।
चंद रोज़ बिताए हैं मैंने ग़रीबी में।
ये अमीर होना होता क्या है।
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