मेरा दर्द,मेरे फसाने मे आता है बार-बार।
है कौन , जो वीराने मे आता है बार-बार।।
दर-ब-दर सिर्फ दुत्कार खायी हैं जिसने।
साकी,वो मयखाने मे आता है बार-बार।।
ब-ज़ाहिर जो शामिल थे आग बुझाने मे।
घर उनके निशाने मे , आता है बार-बार।।
कुरबत की वो इबारत, जो लिखता हूँ मै।
मजा उन्हें , मिटाने मे आता है बार-बार।।
जिसकी जुस्तजू है मिलता नही अक्सर।
ये वाक्या जमाने मे,यूँ आता है बार-बार।।
खुद ही, गिरकर संभलने लगा हूँ अब मै।
लुत्फ,उनको गिराने मे आता है बार-बार।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X