वो ही दास्तां , वो ही फसाने लिखे थे।
गिले-शिकवे भी, सारे पुराने लिखे थे।।
यूं तो दरिया किनारे घर था मेरा,मगर।
मुकद्दर में,ये प्यासे मयखाने लिखे थे।।
हर सिम्त, बज़्म सजी थी यूं दूर तक।
पर मेरे नाम,ख़ामोश वीराने लिखे थे।।
तेरी चिठ्ठी पढ़कर भी सुकूं ना मिला।
इनमें तो फांसलों के बहाने लिखे थे।।
वो तहरीर ही मुंसिफ ने फाड़ दी थी।
जिसमें,कातिल के ठिकाने लिखे थे।।
-यूनुस खान
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