शकील बदायूंनी हमारे बचपन की यादों में बसा नाम है। रेडियो पर विविध भारती सुन सुनकर जवान होने वाली पीढ़ी को अच्छी तरह पता है कि शकील बदायूंनी कौन थे। क्या जमाना था जब कान में पड़ने वाला हर दूसरा सुरीला गाना शकील बदायूंनी की कलम की निशानी रखता था। कितने रंगीन, कितने रूमानी मगर कितने सादा लफ्ज़ होते थे शकील साहब की शायरी में....!
सुहानी रात ढल चुकी, न जाने तुम कब आओगे....
जहां की रुत बदल चुकी, न जाने तुम कब आओगे.....
- (दुलारी)
और
प्यार किया तो डरना क्या, जब प्यार किया तो डरना क्या
प्यार किया कोई चोरी नहीं की, छुप छुप आहें भरना क्या ......
(मुगल-ए-आजम)
मैंने पहली बार उन्हें ग्वालियर में मेले के मुशायरे में देखा...
लेकिन हममें से बहुत लोग नहीं जानते होंगे कि उत्तर प्रदेश के बदायूं में 1916 में जन्मे और पले-बढ़े शकील साहब किस दरजा शरीफ और तहजीबदार थे। इसकी एक मिसाल निदा फ़ाज़ली की किताब `चेहरे` में पढ़ने को मिलती है, जिसमें उन्होंने ग्वालियर के एक मुशायरे को याद किया है। वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस किताब के अपने आलेख में निदां साहब लिखते हैंः
''मैंने पहली बार उन्हें ग्वालियर में मेले के मुशायरे में देखा और सुना था। गर्म सूट और टाई, खूबसूरती से संवरे हुए बाल और चेहरे की आभा से वे शाइर से अधिक फिल्मी कलाकार नज़र आते थे। मुशायरा शुरू होने से पहले वे पंडाल में अपने प्रशंसकों को आटोग्राफ से नवाज़ रहे थे। उनके होठों की मुस्कुराहट कलम की लिखावट का साथ दे रही थी। शकील को अपने महत्व का पता था। वे यह भी जानते थे कि उनकी हर हरकत और इशारे पर लोगों की निगाहें हैं।''
इस मुशायरे में हजरत दाग़ के अंतिम दिनों के प्रतिष्ठित मुकामी शाइरों में हजरत नातिक गुलावटी, को भी नागपुर से बुलाया गया था। लंबे पूरे पठानी जिस्म और दाढ़ी रोशन चेहरे के साथ वो जैसे ही पंडाल के अंदर घुसे, सारे लोग सम्मान में खड़े हो गए।
शकील इन बुजुर्ग के स्वभाव से शायद परिचित थे, वे उन्हें देखकर नातिक साहब का ही एक लोकप्रिय मत्ला पढ़ते हुए उनसे हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ेः
वो आंख तो दिल को लेने तक बस दिल की साथी होती है
फिर लेकर रखना क्या जाने, दिल लेती है और खोती है....
लेकिन मौलाना नातिक इस प्रशंसा स्तुति से खुश नहीं हुए। उनके माथे पर उन्हें देखते ही बल पड़ने लगे। वे अपने हाथ की छड़ी को उठा-उठा कर किसी स्कूली उस्ताद की तरह भारी आवाज में बोल रहे थे --- बर्खुरदार मियां शकील, तुम्हारे तो पिता भी शाइर थे और चाचा मौलाना जिया उल कादरी भी उस्ताद शाइर थे। तुमसे तो छोटी छोटी गलतियों की उम्मीद हमें न थी। पहले भी तुम्हें सुना-पढ़ा था मगर कुछ दिन पहले ऐसा महसूस हुआ कि तुम भी उन्हीं तरक्की पसंदों में शामिल हो गए हो जो रवायत और तहजीब के दुश्मन हैं।
शकील इस अचानक आक्रमण के लिए तैयार नहीं थे। वे घबरा गए लेकिन बुजुर्गों का सम्मान उनके स्वभाव का हिस्सा था। वे सबके सामने अपनी आलोचना को मुस्कुराहट से छुपाते हुए उनसे पूछने लगे "हज़रत आपकी शिकायत वाज़िब है लेकिन मेहरबानी करके गलती की निशानदेही भी कर दें तो मुझे उसमें सुधारने में सुविधा होगी। आप फरमाएं मुझसे कहां भूल हुई है?"
''बर्खुरदार आजकल तुम्हारा एक फिल्मी गीत रेडियो पर अक्सर सुनाई दे जाता है, उसे कभी कभार मजबूरी में हमें भी सुनना पड़ता है, उसका पहला शेर यों हैः
चौहदवीं का चांद हो या आफताब हो
जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो ..........
मियां इन दोनों मिसरों का वजन अलग अलग है। पहले मिसरे में तुम लगा देने यह दोष दूर किया जा सकता था। कोई और ऐसी गलती करता तो हम नहीं टोकते, मगर तुम तो हमारे दोस्त के लड़के हो, हमें अज़ीज़ भी हो, इसलिए सूचित कर रहे हैं। बदायूं छोड़कर मुंबई में भले ही बस जाओ मगर बदायूं की विरासत का तो निर्वाह करो।''
शकील अपनी सफाई में फिल्मों में संगीत और शब्दों के रिश्ते और उनकी पेचीदगी को बता रहे थे। उनकी दलीलें काफी सूचनापूर्ण और उचित थीं, लेकिन मौलाना नातिक ने इन सबके जवाब मेंसिर्फ इतना ही कहा ---- मियां हमने जो मुनीर शिकोहाबादी और बाद में मिर्जा दाग़ से सीखा है उसके मुताबिक तो यह गलती है और माफ करने लायक गलती नहीं है। हम तो तुमसे यही कहेंगे कि ऐसे पैसे से क्या फायदा जो रात दिन फ़न की कुर्बानी मांगे।
उस मुशायरे में नातिक साहब को भी शकील के बाद अपना कलाम पढ़ने की दावत दी गई थी। उनके कलाम शुरू करने से पहले शकील ने खुद माइक पर आकर कहा था, हजरत नातिक इतिहास के जिंदा किरदार हैं। उनका कलाम पिछली कई नस्लों से ज़बान और बयान का जादू जगा रहा है। कला की बारीकियां समझने का तरीका सिखा रहा है और मुझे जैसे साहित्य के नवागंतुकों का मार्ग दर्शन कर रहा है। मेरी गुजारिश है आप उन्हें उसी सम्मान से सुनें जिसके वे अधिकारी हैं।"
तो ये थे शकील बदायूंनी और ऐसी थी उनके मन में बुजुर्गों के प्रति इज्जत। अपने इस शेर में उन्होंने शायद अपने किसी बुजुर्ग को ही याद किया होगाः
क्या कीजिए शिकवा दूरी का, मिलना भी गजब हो जाता है,
जब सामने वो आ जाते हैं, अहसासे अदब हो जाता है ।
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मैंने पहली बार उन्हें ग्वालियर में मेले के मुशायरे में देखा...
8 वर्ष पहले
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