उर्दू के मक़बूल शायरों में एक नाम ख़ुमार बाराबंकवी का भी है जिन्हें सुनने के लिए श्रोता दूर-दूर से आया करते थे। लोग उनके बड़े प्रशंसक थे और अपने इस पसंदीदा शायर को बड़े गौर से सुना करते थे। लेकिन एक बार की बात है कि मुशायरे के लिए गए ख़ुमार के साथ कुछ ऐसा हुआ कि बात गाली-गलौज से लेकर हाथापाई तक आ गई। यह संस्मरण वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब 'चेहरे' में निदा फ़ाज़ली ने लिखा है।
निदा लिखते हैं कि...
निदा लिखते हैं कि, "राजस्थान के ख़ूबसूरत शहर उदयपुर में मुशायरा था। कुछ शायर आ चुके थे, कुछ आने वाले थे। मैं होटल के एक कमरे में हिन्दी, उर्दू के मुकामी अदीबों और शायरों और पत्रकारों से बातचीत में मसरूफ़ था कि इतने में बुलंद क़ामत, मोटा ताज़ा शख़्स पुलिस अॉफ़िसर की वर्दी में अंदर दाखिल हुआ और मुझसे निहायत बेतकल्लुफ़ी से तू-तकार के लहजे में बात करने लगा।
"क्यों भाई कैसा है तू? अच्छा हुआ तू आ गया, लगता है, मुझे नहीं पहचान रहा बेटा। अबे ग़ौर से देख मैं तेरे वालिद का दोस्त हूं। मेरा नाम अहमद जमाल है। डिप्टी पुलिस कमिश्नर अहमद जमाल। तेरा बाप मेरा लंगोटिया यार था तुझे मैंने नंगा घूमते देखा है। पजामा पहनना तो बाद में सीखा तू,...।"
अहमद जमाल का तू-तकार का लहजा मुझे अच्छा नहीं लगा। वह भी दूसरों के सामने। वालिद का हवाला सुनकर मैं ख़ामोश था और यूं भी वे अब इतनी दूर जा चुके थे कि उनसे अब कुछ मालूम नहीं किया जा सकता था। मालूम करने के लिए ख़ुद को नामालूम करना था। जिस बचपन का वो ज़िक्र फरमा रहे थे वह अब किसे याद था? हालांकि, इस हवाले के बावजूद मैं उन्हें पहचान नहीं पा रहा था। मेरे प्रशंसकों के सामने उनके बातचीत के अंदाज़ ने मुझे उलझन में डाल दिया। मैं अपने ग़ुस्से को छुपाना भी चाहता था और उन पर अपनी अहमियत जताना भी चाहता था। अच्छा हुआ वे दो-तीन-चार जुमले बोलकर चले गये। मैंने फ़राग़त की सांस ली, लेकिन वे थोड़ी देर बार फिर ड्राइंग रूम में नज़र आ गए और फिर वही बेतकल्लुफी़ अबे-तबे वाली!"
उस वक़्त अगर...
उस वक़्त अगर शायर खु़मार बारबंकवी न आते तो शायद अहमद जमाल फ़ाज़ली से अबे-तबे वाले लहजे में बात करते रहते। फ़ाज़ली लिखते हैं, "मैंने इसी दौरान खिड़की से देखा 'खु़मार' साहिब की टैक्सी होटल में अंदर आ रही है। मुझे अचानक एक चाल सूझी। मैंने फ़ौरन पलट कर 'जमाल' से कहा, "जमाल साहिब अच्छा हुआ आप आ गए।" "क्यों क्या बात? क्या चाहिए तुझे" उन्होंने दरियाफ़्त किया। "भाई जान मुझे कुछ नहीं चाहिए। इस वक़्त स्टेशन पर 'ख़ुमार' साहिब को आपकी मदद की ज़रूरत है। अभी-अभी फ़ोन आया था। वो शराब के नशे में थे और रेलवे पुलिस ने उन्हें लाकअप में डाल दिया है।" मैंने उन्हें टालने के लिए यह बहाना तराशा था। वो सुनते ही संजीदा हो उठे।
'बदतमीज़, गधे, गंवार कहीं के। मैं अभी उनको छुड़ाकर लाता हूं।' वो औल-फौल बकते हुए उल्टे पांव लौट गये, लेकिन अभी वो मुश्किल से जीने की दो सीढ़ियां ही उतर पाए थे कि इतने में उन्हें 'ख़ुमार' साहिब नज़र आ गये। उन्हें देखते ही वो घबराई हुई आवाज़ में उनसे पूछने लगे- "कहिए हज़रत पुलिस लाकअप में किसी हरामज़ादे ने बदतमीज़ी तो नहीं की?" 'जमाल' 'ख़ुमार' को जानते थे, ख़ुमार उन्हें नहीं पहचानते थे। 'ख़ुमार' ने उन्हें नीचे से ऊपर तक देखा और पूछा कौन से लाकअप की बात कर रहे हैं आप?
मुझे 'ख़ुमार बाराबंकवी' कहते हैं। मैं मुशायरे के लिए हाज़िर हुआ हूं... मैं जानता हूं किब्ला! मैं उसी लाकअफ की बात कर रहा हूं, जहां कुछ देर पहले आप को बंद किया गया था। मैं आपको ही छुड़ाने के लिए जा रहा था, अच्छा हुआ... 'ख़ुमार' जमाल की बात सुनकर ज़मीन पर सन्दूक रखकर खड़े हो गए... 'मुझे लगता है आपको दिमाग़ के इलाज की ज़रूरत है।' 'ख़ुमार के इस कटाक्ष ने जमाल को नाराज़ कर दिया और वो झल्लाकर कहने लगे, "वाह साहब वाह, शराब आप पियें, बहकें आप और दिमाग़ का इलाज मैं कराऊं? बुजुर्गवार ख़ैरियत जानिये। आप मेहमान हैं, अगर कोई और इस तरह की बात करता तो ऐसी मरम्मतत करता कि सारी शायरी-वायरी भूल जाता। आप कैसै शायर हैं? किससे कैसी बात करनी चाहिए यह भी आपको नहीं मालूम? मैं यहां डिप्टी पुलिस कमिश्नर हूं। समझे।" उन्होंने आवाज़ ऊंची करके और आंखें निकालकर कहा।"
काफ़ी देर तक...
काफ़ी देर तक पहले 'ख़ुमार' ने जमाल की बातें सुनीं, लेकिन जब वह अपने रंग में आए तो फिर उन्होंने डिप्टी कमिश्नर जमाल को ख़ूब सुनाई। फ़ाज़ली लिखते हैं, "अब 'ख़ुमार' के ग़ुस्से की बारी थी। उन्होंने अपनी ख़ास गालियों का स्टॉक निकाला और उन पर बरसाना शुरू कर दिया। डिप्टी कमिश्नर ने अब तक दूसरों को गालियां दी थीं। गालियां खाई नहीं थीं और वे भी ख़ालिस बाराबंकवी। उन्हें शायद यह भी इल्म नहीं था कि 'ख़ुमार' ग़ज़ल के मिज़ाजदां नहीं थे, गालियों के हुक्मरां भी थे।
जिन्होंने 'ख़ुमार' को मुशायरों के स्टेज पर देखा था, वो जानते थे कि वो जिस शायर के ध्यान आकृष्ट करने पर उसे वाह और सुब्हान अल्लाह से नवाज़ते थे, उसकी नज़र फिरते ही उसकी मां-बहन का बखान शुरू कर देते थे। लेकिन यहां मुशायरे का स्टेज नहीं था। मामला आमने-सामने का था। देखते-देखते हाथापाई शुरू हो गयी और इस इत्तिफ़ाक़ मुठभेड़ में 'जमाल' की बनावटी बत्तीसी के सामने के तीन-दांत के साथ 'ख़ुमार' साहिब की शेरवानी के दो बटन बी शहीद हो गए। इस तरीक़े से अहमद जमाल की तू-तकार तो मुशायरे की समाप्ति तक ज़रूर ख़ामोश रही लेकिन इसमें 'ख़ुमार' को जो परेशानी हुई, उसके लिए मैं शर्मिंदा था। 'ख़ुमार' साहिब को अस्ल वाक़िए का इल्म हुआ तो उन्होंने अपने पान सुपारी और तम्बाकू के बटुए से कुछ और बड़ी-छोटी गालियां निकालकर 'जमाल' की ग़ैरहाज़िरी में उसकी नज़्र (भेंट) कर दीं।"
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