गीतकार शंकर शैलेन्द्र हिन्दी सिनेमा के कबीर जिन्होंने जीवन के सार और दार्शनिकता को करीने से अपने गीतों में पिरोया। इंसानी मूल्यों और जीवन के पहलुओं को अपने गीतों में घोलकर उन्होंने ऐसे गीत लिखे जो आसानी से लोगों की ज़बां पर चढ़े रहें। आज भी वो सारे गीत अपनी पहचान बरक़रार किए हुए किसी भी कोने से आकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा जाते हैं। रात ढलती है, सूरज कुछ देर के लिए देहरी पर चढ़ आता है और उतर जाता है, लेकिन ये गीत आपका साथ नहीं छोड़ते।
शैलेन्द का जन्म 30 अगस्त, 1923 को (वर्तमान पाकिस्तान) रावलपिंडी में हुआ और उन्होंने अपना बचपन मथुरा में गुज़ारा। उनके शुरुआती दिन बेहद कठिन थे और इन्हीं दिनों उन्होंने ख़ुद को कविता से जुड़ता पाया। कम उम्र में मुश्किल वक्त से पहचान ने ही शैलेन्द्र के लिए कविताओं और गीतों की ज़मीन तैयार की। जिस साल देश ने आज़ादी की चौखट की दूसरी ओर पहला कदम रखा उसी साल शैलेन्द्र नौकरी के लिए बम्बई (वर्तमान मुम्बई) पहुंचे। इप्टा (IPTA) से जुड़े रहते हुए उन्होंने कई मुशायरों और कवि सम्मेलनों में अपनी कविताएं पढ़ीं और उनकी कविताओं से निकले उनके आज़ाद बोल पूरी बम्बई में हलचल करने लगे।
वक्त ने करवट लेना शुरू किया और शैलेन्द्र ने पहले मना करते हुए, आख़िरकार राज कपूर के साथ काम शुरू किया और हिन्दी सिनेमा को 1949 में "बरसात" नाम से पहला शीर्षक गीत देने वाला गीतकार मिला।
शैलेन्द्र ने बरसात फ़िल्म के गीतों की ही तरह अपनी पहचान भारतीय सिनेमा में बनाई, राज कपूर एक रोज़ शैलेन्द्र को बड़ी ज़ोर आज़माइश करके निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास के घर एक फ़िल्म की कहानी सुनाने ले गए। शैलेन्द्र रूखे मन से साथ चले भी गए। एकदम साधारण से कपड़े पहनने वाले शैलेन्द्र चुपचाप वहां बैठे कहानी सुनते रहे, ख़्वाजा अहमद अब्बास ने भी उन्हें ठीक ढंग से नहीं पहचाना। लगभग ढाई-तीन घंटों तक चुपचाप कहानी सुन रहे शैलेन्द्र से जब आख़िरकार पूछा गया तो वो मुस्कुराकर बोले - "बेचारा गर्दिश में था, आसमान का तारा था, आवारा था।" ख़्वाजा अहमद अब्बास चौंके और राज कपूर से बोले - " साहब इनका परिचय ठीक से कराया जाए, इन्होंने मेरी पूरी कहानी एक लाइन में कह दी।"
शैलेन्द्र की कलम का कमाल था कि गीत "आवारा हूं" जिसे आवाज़ मुकेश ने दी और संगीत शंकर जय किशन ने पूरी दुनिया में पसंद किया गया। अंत में छोड़ जाते है आपको उस गीत के बोल के साथ-
आवारा हूं
आवारा हूं
या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं
आवारा हूं
घर-बार नहीं, संसार नहीं
मुझसे किसी को प्यार नहीं
उस पार किसी से मिलने का इकरार नहीं
मुझसे किसी को प्यार नहीं
सुनसान नगर अनजान डगर का प्यारा हूं
आवारा हूं
आबाद नहीं, बर्बाद सही
गाता हूं खुशी के गीत मगर
गाता हूं खुशी के गीत मगर
ज़ख्मों से भरा सीना है मेरा
हंसती है मगर ये मस्त नज़र
दुनिया
दुनिया मैं तेरे तीर का
या तकदीर का मारा हूं
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