संयोग में प्रेमी प्रेमिका के लिए सर्वाधिक प्रेम मग्न दिवसों का आगमन तो वियोग में विरह की तीव्रता का काल।किसी कमज़ोर छत वाले गृहस्थ को घर टपकने की चिंता का कारण तो धनवानों के लिए सैर सपाटा की वजह।
जिसने धान रोप दिये उसके लिए बारिश वरदान तो जिसकी मक्का की फ़सल अभी नहीं सूखी उसके लिए चिंता का विषय।किसी के लिए अदरक की चाय और पकौड़ों के स्वाद तो किसी के लिए चूल्हा,कपड़े,बिस्तर बचाने के लिए पन्नियों को तानने की जद्दोजहद। सावन यानी गदराते जामुन-शीरा शीरा आमों की जाती बहार तो छतरियों की बिक्री में तेज़ी,बिल्ब पत्रों के महत्व के दिन।
बरसात में बढ़ता बुज़ुर्गों की हड्डियों का दर्द तो बच्चों के लिए रेनी डे की छुट्टी की घंटी। पति की पत्नी के गाल पर काटी चिकोटी और चुहल तो अख़बार भीग जाने से चिड़चिड़ाहट भी। सड़कों पर काँवरियों का झुंड और बम बम भोले के जयकारे की गूँज तो मंदिरों में फूल,धतूरा, बेल पत्र बेचतीं स्त्रियों की आवाज़ -'बाबू जी दस रुपये का है एक दोना,ले जाओ महादेव को खुस हो जाएंगे।'
पॉश कॉलोनी और सोसाइटीज़ में रहने वालों के लिए बारिश के बाद धुली-धुली चमकती सड़कों की सौगात तो गली कूंचों में रहने वालों के लिए बजबजाती नालियों,सड़कों के ताल बन जाने पर आक्रोश। नव विवाहिताओं के मायके आने के दिन तो गृहस्थी में उलझी हुई अनेक स्त्रियों के मन मसोस कर ससुराल में ही रह जाने की विवशता।
अमीर खुसरो की ये रचना याद हो आयी-
काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
भैया को दियो बाबुल महले दो-महले
हमको दियो परदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस ई
हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ
जित हाँके हँक जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
सच, कैसे-कैसे बरसता है सावन सब पर। लेकिन ये भी सत्य है कि इस मौसम का आधार उत्साह ही है। सावन आते ही मन झूमने लगता है,गाने लगता है।मोर की तरह थिरकने लगता है,हिरन की तरह विचरने लगता है।
नदी की तरह उमंगित,तरंगित,पुलकित हो जाता है।
जैसे आकाश में बादल घने होने पर बारिश होती है,फुहारें बरसती हैं, बौछारें गिरती हैं वैसे ही लगता है इस मौसम में हमारे मन के आकाश पर भी बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। ये बादल प्रसन्नता के,हर्ष के,स्मृतियों के होते हैं।
इन दिनों प्राकृतिक परिवेश हरा-भरा,धुला- धुला सा हो जाता है। जिसे देख मन हर्षाने लगता है। कितने ही फिल्मी गाने होंठों पर स्वयं ही आने लगते हैं।
अहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिए ...!
मेघा रे मेघा रे मत परदेस जारे आज तू प्रेम का संदेस बरसा रे...!
रिमझिम गिरे सावन सुलग-सुलग जाए मन....!
अनगिनत कजरी-मल्हार गूँजने लगते हैं -
झूला तो पड़ गयो अमुआ की डाल पै जी...!
कच्चे नीम पै निंबौरी सावन बेगि आइयौ जी ..!
अरी भैना छाई घटा घनघोर सावन दिन आ गए..!
हरियाली तीज का त्योहार, हरी चूड़ियाँ, सिंगार, मेहंदी, आम-बरगद के मोटे तनों पर पड़े झूले, मायका,घेवर ये सब सावन की देन हैं। कितनी ही स्मृतियों के घने बादल घिर जाने का समय है। हिंदी साहित्य में तो सावन विशेष रूप से वर्णित है। कालिदास का 'मेघदूत' कालजयी कृति है। जिसमें एक यक्ष ने अपनी पत्नी को मेघ के माध्यम से संदेस भेजा है। भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'आज पानी गिर रहा है' पढ़ते ही जैसे जल - जल हो जाता है मन।
यह मास शिव भक्ति का है। आंतरिक चेतना और ऊर्जा को महसूस करने जैसा है। ऐसा लगता है कि इस मास में संग्रहीत की गयी ऊर्जा हमें वर्ष भर बल और प्रसन्नता देती है।
"सचमुच, सावन केवल बादल नहीं बरसाता, वह स्मृतियाँ, संवेदनाएँ, उम्मीदें और जीवन के असंख्य रंग भी बरसाता है। हर व्यक्ति पर उसका बरसना अलग होता है, पर एक बात समान रहती है—वह मन के किसी न किसी कोने को अवश्य भिगो जाता है।"
सावन,सावन,सावन
ऐसे,ऐसे,ऐसे बरसते हो तुम सब पर।
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