अदब साहिर के रास्ते होते हुए जीवन में आया था। वो कॉलेज के दिन थे और साहिर-अमृता की प्रेम कहानी के तसव्वुर के भी। मैं साहिर के गीत सुनती थी और सोचती थी कि ये सब अमृता प्रीतम के लिए हैं, फिर पता चला कि एक सुधा मल्होत्रा भी थीं जिनसे साहिर को प्रेम हुआ, एक इमरोज़ था जिसके साथ अमृता आख़िरी समय तक रहीं और उन दोनों के जीवन की कई परतें खुलती गईं। नज़्मों के सहारे आंकलन लगे और अमृता की रसीदी टिकट के बहाने एक तरफ़ा मोहब्बत की दास्तान जानी। साहिर के जानने बहुत सहारे नहीं थे सिवा इंटरनेट और कुछ किताबें, किताबें भी जिनमें गीत ज़्यादा रहे और उनका जीवन कम। हालांकि ये कहना भी लगभग सच है कि साहिर के गीत में उनकी ज़िंदगी का प्रतिबिम्ब ही है। फिर भी पसंदीदा गीतकार के तन्हा जीवन के बारे में जानने में दिलचस्पी बनी रही। अरसे बाद जो किताब मिली और साहिर के जीवन का एक उम्दा तवील लेखा-जोखा है।
जब मुझे मेरे बॉस ने ये किताब दी तो मुझे लगा कि इसमें भी वही अफ़साने होंगे जो हमेशा से इतने वर्षों से सुनती आई हूं, ये बात उनसे कही भी लेकिन वे बोले कि किताब अच्छी है। फिर दफ़्तर के रोज़ के काम की तरह किताब को पढ़ना शुरु किया। लेकिन शुरु के पन्ने पढ़कर इतना तो लगा कि ये किताब साहिर पर तफ़्सील से लिखी गई किताब है कि किताब में उस आदमी तक का ब्यौरा है जिसके नाम पर अब्दुल हई नाम रखा गया था (अब्दुल हई ही आगे चलकर साहिर हुए)। इस बात का कुछ रंज रहा कि कोई साहिर के दोस्तों से बात करके उनके प्रेम-संबंधों के बारे में, उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में लिख क्यूं नहीं देता लेकिन इस किताब का लेखन तसल्ली देता है कि जितना संभव जुटाया जा सका, जुटाकर साहिर के जीवन को उनके चाहने वालों के नाम पेश किया गया है।
किताब का नाम है ‘ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया,’ ये साहिर के गीत की पंक्ति है जिससे किताब का उनवान सजा है। लेखक राजेश बादल हैं जिन्होंने साहिर पर वृत्तचित्र भी बनाया है। उन्होंने गायक रफ़ी की बेटी से लेकर, साहिर के तमाम दोस्त, गीतकार और बहन से बातचीत के बाद पूरे मनोयोग से इस किताब को लिखा है। 380 पन्नों की ये किताब इतने पन्ने होने का एहसास नहीं देती। एक सिटिंग में मैंने 150 पन्ने तक पढ़े हैं। ये इसलिए नहीं कि साहिर मुझे पसंद हैं लेकिन इसलिए भी उन्होंने वे तमाम गीत लिखे हैं जिन्हें हम आज भी गुनगुनाते हैं, सुनते हैं, कभी रेट्रो के नाम पर, कभी क्लासिक के नाम पर और कभी कल्ट के नाम पर। आज भी अगर आप पुराने 10 बेहतरीन गीतों की लिस्ट बनाएंगे तो उनमें से 6 से 7 गीत साहिर के लिखे होंगे। ग़ज़लों और नज़्मों का सिनेमा में प्रयोग, गीतकारों को रॉयल्टी और रेडियो से उनके नाम की उद्घोषणा जैसे कितने काम साहिर ने लेखक और उनकी पीढ़ी के हवाले किए हैं। फिर ये तमाम बातें इस किताब में विस्तृत तरीके से लिखी गई हैं।
499 रूपये की ये किताब मंजुल प्रकाशन से आई है। साहिर को जितना मैंने पढ़ा और जाना है, यह बात कह सकती हूं कि इसे पढ़ने के बाद साहिर और ख़ास तौर पर अमृता के नाम से जुड़े क़िस्से कहीं और नहीं खोजने पड़ेंगे। अमृता की ज़िक्र इसलिए ज़रूरी है कि वो साहिर के इश्क़ की दुनिया के साथ चस्पा हो चुकी हैं। साहिर बचपन की तल्ख़ी से बने और अपनी मां का संघर्ष देखते हुए बड़े हुए थे। अकेलेपन से घबराते थे, लिफ़्ट से डरते थे और वे कौन से कपड़े पहनें इसकी सलाह भी दोस्तों से लेते थे। अकेलेपन का उपाय शाम को दोस्तों का महफ़िल हुआ करती थी और मां उनकी कॉन्सटेन्ट थीं, यानी हमेशा जिन्हें वो हर बात बताते थे। किताब पढ़कर आप एहसास कर पाएंगे कि मां के जाने के बाद वो अवसारग्रस्त हो गए, महफ़िलें और मुशायरे भी छोड़ दिए। बहुत लंबे समय तक जी नहीं सके।
लेकिन ऐसे फ़नकार इतना कुछ दे जाते हैं दुनिया को कि उनका दैहिक रुप में जाना उनके काव्य में रूपांतरित हुआ लगता है। साहिर उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्होंने विभाजन के बाद पाकिस्तान से त्रस्त आकर भारत को चुना, भारत को चुनने के लिए जान हथेली पर रखी, हिन्दुस्तान से दिल लगाए रखा और इस धरती ने भी खुले हाथों उनका स्वागत किया। साहिर वो मिट्टी हैं जिससे सदाबहार गीतों के फूल निकले लेकिन बावजूद वो समय-समय पर पानी का, रौशनी का इंतज़ार करती रही लेकिन फूलों का खिलना बंद नहीं हुआ। इसी को तो जादू कहते हैं, साहिर माने जादू।
बहरहाल किताब सभी प्लैटफॉर्म पर उपलब्ध है। इसे पढ़कर ज़हन में 6 फ़ुट के आदमी की तस्वीर बनेगी, जो अपनी लंबी नाक और चेचक के दाग़ को लेकर शाई था लेकिन कमाल का गीतकार था, गोट था- G.O.A.T. गोट।
एक दिन पहले
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